कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला 12 सितम्बर 1939 — 31 मार्च 2022 न भूतो न भविष्यति…

कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला गांव मुंडिया तहसील टोड़ाभीम जिला करौली राजस्थान 12 सितम्बर 1939 — 31 मार्च 2022 #VoiceOfMundiya न भूतो न भविष्यति… प्रणाम पटरी वाले बाबा। प्रणाम लाल पगड़ी वाले बाबा। प्रणाम वंचितों के मसीहा। प्रणाम योद्धा क्रांतिकारी। प्रणाम महान समाज सुधारक। प्रणाम महानायक। प्रणाम युगपुरुष। प्रणाम कर्नल बैंसला। कुछ व्यक्तित्व केवल अपने जीवनकाल तक सीमित नहीं रहते। वे अपने पीछे एक विचार, एक संघर्ष और एक इतिहास छोड़ जाते हैं। कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला भी ऐसा ही नाम हैं। करौली जिले के मूंडिया गांव से निकलकर भारतीय सेना में अपनी पहचान बनाने वाले बैंसला जी ने देश की सीमाओं पर सैनिक के रूप में सेवा की। वे 1962 के भारत-चीन युद्ध तथा 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में शामिल रहे और 1965 के युद्ध में युद्धबंदी भी बने। बाद में वे लेफ्टिनेंट कर्नल के पद से सेवानिवृत्त हुए। लेकिन सेना से सेवानिवृत्ति उनके संघर्ष का अंत नहीं था। यहीं से उनके जीवन का दूसरा अध्याय शुरू हुआ—समाज के लिए संघर्ष का अध्याय। जब एक सैनिक ने समाज की आवाज उठाई राजस्थान के गुर्जर समाज में शिक्षा, रोजगार और प्रतिनिधित्व से जुड़े सवाल लंबे समय से मौजूद थे। कर्नल बैंसला ने इन सवालों को केवल भाषणों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें एक संगठित आंदोलन का रूप दिया। 2007 में उनके नेतृत्व में गुर्जर आरक्षण आंदोलन ने राजस्थान ही नहीं, बल्कि पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा। आंदोलन का प्रमुख उद्देश्य गुर्जर समाज को अनुसूचित जनजाति की श्रेणी में शामिल कराने की मांग था। लाल पगड़ी, सफेद कुर्ता और हाथ में लाठी लिए एक पूर्व सैनिक—और सामने एक विशाल जनसमूह। यही तस्वीर धीरे-धीरे “पटरी वाले बाबा” की पहचान बन गई। रेल की पटरियां आंदोलन का प्रतीक बनीं और राजस्थान के कई हिस्सों में रेल व सड़क मार्ग प्रभावित हुए। आंदोलन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें भी हुईं और बड़ी संख्या में लोगों की जान गई। यह इतिहास का वह अध्याय है जिसे याद करते समय संघर्ष के साथ-साथ उन सभी जानों की पीड़ा को भी याद करना जरूरी है। 2008 — संघर्ष और भी तेज हुआ 2008 में आंदोलन फिर बड़े स्तर पर सामने आया। कर्नल बैंसला की अगुवाई में गुर्जर समाज ने आरक्षण की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन किया। यह केवल आरक्षण की मांग नहीं रह गई थी; यह आंदोलन सम्मान, हिस्सेदारी, शिक्षा और आने वाली पीढ़ियों के अवसरों का प्रश्न बन चुका था। कर्नल बैंसला का अंदाज सैनिकों जैसा था— स्पष्ट लक्ष्य, अनुशासन और पीछे न हटने का संकल्प। इसी दौर में उन्होंने सरकार के सामने अपनी मांगों को मजबूती से रखा। बाद के वर्षों में गुर्जर समाज के लिए विशेष पिछड़ा वर्ग यानी MBC के तहत 5 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था का रास्ता बना। 2019 में राजस्थान विधानसभा ने संबंधित आरक्षण विधेयक पारित किया। 2015 और फिर 2019-20 तक जारी रहा संघर्ष कर्नल बैंसला का संघर्ष 2007-08 पर समाप्त नहीं हुआ। 2015 में भी उनके नेतृत्व में बड़ा आंदोलन हुआ। इसके बाद 2019 में आरक्षण को लेकर फिर आंदोलन हुआ और दिल्ली-मुंबई रेल मार्ग पर मालनादूंगर क्षेत्र में प्रदर्शन ने राष्ट्रीय ध्यान आकर्षित किया। 2020 में भी आरक्षण के प्रावधानों के क्रियान्वयन को लेकर गुर्जर समाज की ओर से आंदोलन की घोषणा हुई और बयाना क्षेत्र में रेल मार्ग अवरुद्ध करने जैसी घटनाएं सामने आईं। यानी— कर्नल बैंसला के लिए संघर्ष कोई एक दिन या एक आंदोलन नहीं था। यह उनके जीवन का लंबा अध्याय था। एक सैनिक की सोच, एक समाज की आवाज कर्नल बैंसला को समझने के लिए केवल उनके आंदोलन को देखना पर्याप्त नहीं है। उनकी कहानी एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जिसने— गांव से शुरुआत की, शिक्षक बने, सेना में सिपाही के रूप में प्रवेश किया, युद्ध देखा, युद्धबंदी बने, कर्नल के पद तक पहुंचे, और सेवानिवृत्ति के बाद समाज के लिए संघर्ष का रास्ता चुना। उनका जीवन यह संदेश देता है कि व्यक्ति की पहचान केवल उसके पद से नहीं होती। पहचान इस बात से होती है कि उसने अपने जीवन का कितना हिस्सा दूसरों के लिए जिया। “पटरी वाले बाबा” क्यों बने अमर? किसी ने उन्हें लाल पगड़ी वाला बाबा कहा, किसी ने पटरी वाला बाबा कहा, किसी ने गुर्जर समाज का महानायक कहा। लेकिन उनके नाम के साथ सबसे बड़ी पहचान जुड़ी— संघर्ष की। उन्होंने अपने समाज को यह एहसास कराया कि अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से संगठित होकर मजबूती से रखना भी एक शक्ति है। उनकी विरासत को केवल आरक्षण के आंकड़े में नहीं बांधा जा सकता। उसमें शामिल है— शिक्षा का महत्व। युवा शक्ति का महत्व। संगठन की शक्ति। सामाजिक चेतना। अपने अधिकारों के प्रति जागरूकता। और आने वाली पीढ़ी के लिए बेहतर भविष्य का सपना। मूंडिया की मिट्टी से निकला वह नाम… जिस मूंडिया की मिट्टी ने उन्हें जन्म दिया, वहीं से निकलकर उन्होंने देश की फौज में सेवा की और बाद में सामाजिक आंदोलन की राष्ट्रीय पहचान बने। 31 मार्च 2022 को जयपुर में उनके निधन के साथ एक युग का अंत हुआ। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव मूंडिया में सैन्य सम्मान के साथ किया गया। लेकिन विचारों की मृत्यु नहीं होती। सैनिक चला गया, लेकिन उसका संघर्ष इतिहास में रह गया। लाल पगड़ी उतर गई, लेकिन उसका स्वाभिमान आज भी दिखाई देता है। आवाज थम गई, लेकिन सवाल आज भी जीवित हैं। और शायद यही किसी महानायक की सबसे बड़ी पहचान होती है— वह स्वयं चला जाता है, लेकिन आने वाली पीढ़ियों को सोचने के लिए एक इतिहास दे जाता है। --- आज जयंती पर शत-शत नमन नमन उस सैनिक को, जिसने देश के लिए लड़ना सीखा। नमन उस योद्धा को, जिसने समाज के लिए आवाज उठाई। नमन उस व्यक्तित्व को, जिसने संघर्ष को अपनी पहचान बनाया। नमन उस महानायक को, जिसने वंचितों की आवाज को आंदोलन की शक्ति दी। प्रणाम पटरी वाले बाबा। प्रणाम लाल पगड़ी वाले बाबा। प्रणाम कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला। आपका संघर्ष इतिहास है। आपका स्वाभिमान प्रेरणा है। आपकी स्मृति आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत है। न भूतो न भविष्यति। जयंती पर शत-शत नमन एवं विनम्र श्रद्धांजलि।

Comments

Popular posts from this blog

मुंडिया की मिट्टी में देशभक्ति की खुशबू, सैनिकों के सम्मान में जुटे सामाजिक कार्यकर्ता कुलदीप गुर्जर छावड़ी

सचिन पायलट को पंजाब भेजना -प्रमोशन है या राजस्थान की रेस से आउट करने का प्लान सचिन पायलट

चन्दवाजी में गुर्जर शिरोमणि कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला की प्रतिमा का भव्य अनावरण